आवाम क्यों जिद्दी बनी है बोलना ही चाहिये
सरे आम ये रुत चली है तौलना ही चाहिये
स्याह काली हो चुकी है यह चादर प्रजातंत्र की
इन्द्र की सत्ता भी अविलम्ब डोलना ही चाहिये
अब समाज प्रबुद्ध हो,दिन रात बस आगे बढे
द्वार नित नये मंजिलों के खोलना ही चाहिये
छोड़ सारे भेद भाव आओ मिटायें घोर तम
प्रगति के सारे पथों को टटोलना ही चाहिये
बातें न हो अधिकार की बस महज प्रतिकार की
फ़र्ज़ भी की जाये अदा,सत्य बोलना ही चाहिये
"राजीव" आ पड़ा है वक्त अब मिल कर चलें
जग में शांति विकास रस घोलना ही चाहिये
राजीव रंजन मिश्र
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