Monday, May 19, 2014

गजल-२३२ 

साँचकेँ आँच की 
तीन आ पाँच की 

मानि ली बातकेँ 
खोंच आ खाँच की 

धर्मकेँ नाम पर 
जातिगत नाँच की
 
बेरपर जैब बुझि 
ठोस आ काँच की 

फूसि राजीव नै 
लाख हौ'क जाँच की 

२१२ २१२ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

Sunday, May 18, 2014

गजल-२३१ 

निरसल मिथिला कानि रहल अछि 
मैथिल नै धरि मानि रहल अछि 

लागल सभ क्यो नीक अपन लै 
अपनेमे ई ठानि रहल अछि 

तिरपित मैथिल चारि टकामे 
कमजोरी सभ जानि रहल अछि 

अपना सतुआ नोन कँ महि महि 
अनका खातिर सानि रहल अछि 

मोदी लालू आर नीतीशक* 
सीटक गनती गानि रहल अछि

के जानल के चूसि रहल आ 
के घरमे की आनि रहल अछि  

जीतल क्यौ राजीव अनेरे 
बुड़िबक छाती तानि रहल अछि 

२२२२ २१ १२२
@ राजीव रंजन मिश्र 

*पाँचम शेरकेँ दोसर पाँतिमे एक टा दीर्घकेँ लघु मानबाक छूट लेल गेल अछि 

Wednesday, May 14, 2014

गजल-२३० 

राम राजक जरूरत घर-घरमे 
चलि रहल धरि सियासत घर-घरमे 

के कहत के छी कम आ के बेसी 
माल जालक हुकूमत घर-घरमे
 
लिपि तँ बिसरल बहुत पहिने यौ बाबू 
मायक भाषा उपासत घर-घरमे 

खोज गामक रहल नै ककरो धरि 
जान चाही अमानत घर-घरमे 

बानि राजीव मनुखक नै बदलल 
नीक लोकक फजीहत घर-घरमे 

२१२२ १२२ २२२ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

Monday, May 12, 2014

गजल-२२९ 

चोट लागै जँ धी-पुतकेँ तरपय छै माए
लाख गलती तँ बेटाकेँ बिसरय छै माए 

एक मायक प्रतापे पोसा गेलय धी-पुत  
सात बेटा अछैतो धरि हुकरय छै माए 
 
बात ककरा हियक किछु कहतै जे बुढ़िया 
नोर आँखिक दबा टकटक निरखय छै माए 

बाँटि अपना मुँहक सदिखन रोटी आ पानि 
राति तीतल बिछौना पर बितबय छै माए 

छैक नेहक त पाछू संसारे बेकल धरि 
नेह सुच्चा अहेतुक टा लगबय छै माए 

ताकि राजीव देखल चहुँ दिसि टा कतबो धरि 
मोन मायक सनक अगबे जुरबय छै माए 

२१२२ १२२२ २२ २२२ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

Saturday, May 3, 2014

गजल-२२८ 

लोकक नै रहल कहियो किछुओ भरोसा
नै सभटा पुरल ककरो कखनो भरोसा

जे अछि रातिमे नहिँयो भेटत सबेरे
कोना के करत कखनो ककरो भरोसा

कुकुरचालि अपने ई डाढल हियाकेँ
जे काबिल सिनेहक नै तकरो भरोसा

लूटल दाग वस्त्रों टा सभ लहासक
नै राखल ग' दइबोकेँ कनियो भरोसा

कोनो आइकेँ नै ई पुरना पिहानी
जे घनसार बनि छल उऱलो भरोसा

सेरेने हियाकेँ छी राजीव फुइसक
भरमेलक सदति सभकेँ सगरो भरोसा

222 1222 22122
@ राजीव रंजन मिश्र 

Friday, May 2, 2014

गजल-२२७ 

मरजीकेँ अपने रहि चलैत अछि आब
हमहीँ टा काबिल छी कहैत अछि आब

ब्यवहारक जे भेटय दरिद्रछिम्मरि तँ 
बऱ अजगुत ई लीला लगैत अछि आब 

संस्कारक ने कोनो रहल ग' ठेकान 
जे ग्यानी से बड़का लठैत अछि आब 

करनी नै कथनी टा हजार गजकेँ ल' 
गंगाजलमे चानन घसैत अछि आब 

छी कारन बस अतबे दुखक तँ राजीव 
ई गौरब जे सभटा अछैत अछि आब 

222 222 121 221 
@ राजीव रंजन मिश्र
गजल-२२६ 

फूकि पजारल घूर छी बाबू
हाँ यौ हम मजदूर छी बाबू 

दुनियाकेँ सभ देल धरि अपने 
गत्तर गत्तर भूर छी बाबू 

रोटी कपऱा ठाँवकेँ खातिर 
बेचल कित्ता धूर छी बाबू 

जीनगीकेँ सभ रंगमे खदकल 
छानल करगर झूर छी बाबू 

सभटा हमरे हाथके रचना 
नै धरि शाने चूर छी बाबू 

की मोजर आ मोल के देलक 
ककरा आँखिक नूर छी बाबू 

जइरेकेँ राजीव नित बिसरब 
जगतीकेँ दस्तूर छी बाबू 

2222 21 222 
@ राजीव रंजन मिश्र