Sunday, November 20, 2011

"दिया जलाये रखना"





हर वक़्त तुम मुसाफिर,निर्भय हो चलते रहना!
प्रभु प्रेम-पालने में,निश्चल हो पलते रहना!!
राहें कठिन भी हो तो,जज्बा बनाये रखना!
मन में सदा संघर्ष की,दिया जलाये रखना!!

हो हर तरफ अँधेरा,और बन्धनों का फेरा!
निज आत्मज्ञान को तुम,तम से बचाए रखना!!
उस ज्योति प्रकाश-पुंज पर,निगाहे टिकाये रखना!
मन में सदा लगन की ,दिया जलाये रखना!!

हो घोर विषम समस्या,जो करना परे तपस्या!
विचलित ना कर ह्रदय को,आशा बनाये रखना!
दिल के सुमन को हर पल,खिलाये रखना!
मन में सदा समर्पण की,दिया जलाये रखना!!

अयेगा दिन वो भी,मंजिल भी पास होंगे!
थक-हार अरचने भी,हो लज्जित,परास्त होंगे!!
पर उस वक़्त भी मुसाफिर,संयम बनाये रखना!
मन में सदा ही प्रेम की,दिया जलाये रखना!!

----राजीव रंजन मिश्र 
१६/११/२०११




Saturday, November 12, 2011


दूर  जाकर भी मै दूर  जा न सका,
तेरी यादों को मै भुला न सका!
तू ने तो दिल के कर दिए  टुकऱे,
तेरी तस्वीर मै जला न सका!
घर में कुछ इस कदर  अँधेरा था कि,
खुद को मै रौशनी में ला न सका!
आंसुओ का भी जिन्दगी में कभी,
बोझ पलकों पे मै उठा न सका!
यूँ तो क्या रह  गया है आँखों में,
तेरा चेहरा मगर गँवा न सका!
पतझर में भी हँसना चाहा सदा,
बहार-ऐ-महफ़िल में भी मुस्कुरा न सका!
जीत लेता  जिंदगी के हर एक जंग को,
अपने दिल को ही मै हरा न सका!
उसको चाहा बऱी  ख़ामोशी से,
'मीत' जिंदगी के सफ़र का बना न सका!
-----राजीव रंजन मिश्रा

Wednesday, November 9, 2011

"माता"


                           
जी चाहता है मेरा माता,मै नमन तुझे सौ बार करूँ!
है भान नहीं तुझको, मै कितना तेरा सम्मान करूँ !!
इश्वर प्यारा है मुझको,है इश्वर कि सत्ता प्यारी!
पर कैसे बतलाऊँ तुझको, तू है दुनिया भर से न्यारी!!
रंग -रंग के फूल खिलाकर, इश्वर ने दुनिया का चमन बनाया!
आजीवन आभारी हू तेरा,मुझको इस गुलशन का राह दिखाया!!
है चाह यही अब इस जीवन में,जब-जब देह धरुं धरती पर!
तेरा ही पावन कोख मिले,हो जन्म मेरा बस तेरे ही घर!!
दे आशीष मुझे माता,बस तेरे नाम का हवन करूँ!
जी चाहता है मेरा माता,मै नमन तुझे सौ बार करूँ!
                                             -राजीव रंजन मिश्र
                                                   २०/१२/१९९४
  

गम न करो दोस्त!
आज जो वक्त,किसी और का है,कल,हमारा भी होगा!
पर सोचना यह है कि,क्या वो वक्त हमे गंवारा भी होगा!!
नदी कि बहती धारा सी,बहना तो हमे है ही!
वक्त को अपने हाथों,कैद करना तो हमे है ही!!
उंचे-उंचे पर्वतों सा,सर हमें भी उठाना है!
राहों से अपने पत्थरों को,चुन-चुन कर हमें हटाना है!!
जीवन रुपी सागर में,कई नदियाँ आकार मिलती है!
सुख-दुख से पालित होकर,कई रंग कि बगियाँ खिलती है!
पक्षियों सा  पर फैलाकर,उरः -उरः कर कहना चाह्ते हैं!
आजाद देश के आजाद जमीं पर,हम आजाद रहना चाह्ते है!!
हमारे जैसा एक नही,कई-कई हजार हैं!
हम सलामत रहे,वो सलामत रहें,इश्वर से प्रार्थी और खुदा के खिदम्तगार हैं!!
---मै नही जानता कि ये रचना,मैने किन परिस्थितियों मे की i इसके उदभव पर मै अत्यन्त आश्चर्यचकित हूँ i
                                                                                                                        --राजीव रंजन मिश्रा

                                                                                                                          २४/१०/१९९३

ज़माने ने बदल डाले,सभी रिश्ते सभी नाते!
न जाने क्यू,कभी कोई किसीका नहीं होता!!
रुलाये औरो को भी वो,कभी वो खुद भी है रोता!
ऐ काश!वो समझ पाते,कि जीवन बस चार पल का नहीं होता!!

हमें तो आदत सी है,बस रुस्वाईयां ही सहने क़ी!
गर आप कुछ कह भी डालो तो,हम वो भी सह लेंगे!!
ये दिल है दिलखराश इतना,कि कुछ भी असर नहीं होता!
जो कहने को बोलोगे,तो दो-चार लब्ज कह लेंगे!!

: जुस्तजू:

           

जिसे  जुस्तजू थी क़ी जन्नत को पा ले!
जो जन्नत मिली तो खुद खो  गया है!!
कुदरत का , यही है दस्तूर यारों !
किस्मत से आगे,न कोई गया है!!