Thursday, January 23, 2014

बितलाहा काल्हि हमर जन्मदिन छल,जेठ-श्रेष्ट,बंधु-बांधव,सखा समांग,हीत-मीत लोकनिक बड़ बेश शुभकामना पाबि भाब विह्वल भेल छी,व्यक्तिगत रूपेँ सभक धनबाद ज्ञापन नै करएत किछु मोनसँ निकलल आखरकेँ मार्फत हम समस्त लोकनिकँ आभार जतेबाक चेष्टा कएल,सभ गोटे स्वीकार करी से विनम्र आग्रह हमर :

मधुर सनेस भेटल काल्हि बेश थोकमे
हजार दीप नेहक बारि गेल मोनमे

सखा पठा सिनेहक ढेर रास कामना
अगाध जोश भरलथि बन्धु पोर पोरमे

सजा हमर दिवसकेँ गेल बोल सोन सन 
कृतग्य भेल हम श्रीमान पूर्ण सोहमे 

भटकि रहल छलहुँ अन्हारमे झमा झमा
अपार शान्ति भेटल आइ मीत कोंढ़मे

नमन हमर करी स्वीकार जेठ श्रेष्ठगण
सदेह हाथ जोड़ल ठाढ़ हम इजोरमे 

विशेष आर की राजीव किछु सखा कहू
मिठाइ धन्यबादक बोरि देल बोलमे 

सभ गोटेकेँ हार्दिक धन्यबाद !!
राजीव रंजन मिश्र 
121 2122 2121 212

Wednesday, January 22, 2014

गजल-१७४ 

सूरज पूरब उगबे करत
चन्ना घटबे बढ़बे करत 

सत्ते गप थिक ई ओतबे  
जनमल जे से मरबे करत 

काबिल बुधिकेँ रखलक सचर  
सनकल बहकल बुरबे करत 

पैघक छोटक टा मान जे 
राखत से धरि जितबे करत 

बरसाती बेंगक काज की 
पड़िते बुन्नी बजबे करत 

आइग फूसक सम्बंध टा 
स्त्री पुरुषक नित रहबे करत 

मानब ई राजीवकेँ 
पापक घइल फुटबे करत 

२२२२ २२१२ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

Monday, January 20, 2014

गजल -१७३ 

नेह भरल मोन डाहल होइ छैक
भाब सिनेहक पियासल होइ छैक

आन त' बदनाम झुट्ठो बात लेल  
लोक अपनकेर मारल होइ छैक 

चाह सदति काल चातककेँ त' एक
ठोप गगनकेर बादल होइ छैक 

त्यागि चलल मोह माया जे सएह
वीर त' किछु एक गानल होइ छैक 

जानि पऱल यैह टा ऐ ठाम रूप
नाम अधिक काल साजल होइ छैक

दोष त' राजीव सदिखन निरविवाद
सोंझ मनुखकेर मानल होइ छैक
२११२ २१२२ २१२१ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

Friday, January 17, 2014

आन दिनक अपेक्षा आइ कनी सबेर-सकाल आँखि फुजि गेल,जाड़क किरदानी देखि किछु फुरा गेल,प्रेषित अछि अपने लोकनिक सोंझा :
गजल-१७२ 

हाड़ कँपकपा रहल अछि जाड़ 
देह कनकना रहल अछि जाड़ 

ठाढ़ भेल डाँर कसने दोमि 
टांग थरथरा रहल अछि जाड़ 

बस गरीब आ अमीरी देख 
बोल बड़बड़ा रहल अछि जाड़ 

साज बाज टोप चादर देखि 
माथ धड़ खसा रहल अछि जाड़
 
कैथरी लदल मनुखकेँ पाबि 
दाँत कटकटा रहल अछि जाड़ 

हाल की कहू अपन राजीव 
मोन चटपटा रहल अछि जाड़ 

२१२ १२१२ २२१ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

Thursday, January 16, 2014

गजल-१७१ 

दिन कहुना काटि लेलहुँ राति भारी भ' गेल
कछ्मच्छी फेर मोनक आइ हाबी भ' गेल 

कोनो चीजक कखन ऐ ठाम भेटल ग' दाम
अनढनकेँ सोझ लोकक हाथ कारी भ' गेल

ललसा छल संग भेटित चारि टा लोककेर
धरि सभ क्यौ पेट खातिर कामकाजी भ' गेल 

ककरा के हाथ जोड़त आ कि आशीष देत
रहि अपने शानमे सभ खानदानी भ' गेल 

अजगुत राजीव ऐ ठा रीत सभटा जगतकँ
बड़ बजने भोथ लोकक वाहवाही भ' गेल 

२२२ २१२२ २१२२ १२१ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

Wednesday, January 15, 2014

गजल-१७० 

कखनोकँ मोन सहकि जाइ छै
अनढनकँ  लेल सनकि जाइ छै

जे साँझ भोर रहल गुम सदति
सेहो त' लोक चहकि जाइ छै

ई नेह चीज त' थिक एहने
भेटल कि डाँर लचकि जाइ छै

बड जे कठोर करम बानिकेँ
तकरो त' हाथ झड़कि जाइ छै

राजीव ई त' बुझल बात थिक
चानन पसरि क' गमकि जाइ छै 

221 2112 212
@ राजीव रंजन मिश्र 

Tuesday, January 14, 2014

गजल-१६९ 

काटि मनुख जिबिते छागरकेँ
स्नान करत गंगासागरकेँ


दोष सदति ताकत गामक धरि
बानि अपन झरकल बागरकेँ 


आब बहत के तीला चाउर
पेट खगल सभकेँ गागरकेँ 


चान चकोरक जोड़ी लाजे
देखि रहल हिय सौदागरकेँ 


मोन अकछि खहड़ल राजीवक
एक भरोसा नटनागरकेँ 

2112  22 222
@ राजीव रंजन मिश्र