Monday, January 13, 2014

गजल-१६८ 

आँखि आँखिमे सभटा कहि गेल
बात बातमे जुलमी गहि गेल

नैन बाणकेँ मारुक खंजरसँ
मोन प्राण अधमारल रहि गेल 

पल उठा क' देखल ओ जखने त'
विश्वमित्र देबालो ढहि गेल

औ नयन कमानक सर बेधलसँ   
वीर हारि टा सगरो महि गेल

नेह धारमे डूबल राजीव
भोर साँझ सभ तारन सहि गेल 

२१२१ २२२ २२१ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

Saturday, January 11, 2014

गजल-१६७

जिनगी जतरा छै मानि चलल हम
पोथी पतरा नै गानि रहल हम

देखल ककरो नै चाँकि कनिकबो
डाहल मोनक निज आप जरल हम

कनकन ठंढीमे ठिठुरल महि धरि 
नेहक धधरा ने तापि सकल हम

टोकल ककरो नै गाम नगर बस
नै झूकल आ नै कात हटल हम 

धरनी ज्ञानक थिक स्वर्णकलश बुझि
ठोपे ठोपे बुरिलेल चखल हम 

गुमसुम अपनामे राजीव पड़ल नित
कबिलाहाकेँ कुटिचालि गमल हम 

२२२२ २२१ १२२ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

Friday, January 10, 2014

गजल-१६६ 

थाकल जे मरि गेल जगतमे
भेटत की फुसियाहि बहसमे 

की जीतल आ हारि चलल की
जानल के ई बात सहजमे

डाहब सदिखन मोन अपन टा
मतलब ककरा गाम नगरमे

दुनियाकेँ ई खेल पुरनगर
लचरल बुरिबक बीच भँवरमे

करमक सभ राजीव नतीजा
ककरो नै लहि गेल अचकमे

२२२ २२१ १२२ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

Wednesday, January 8, 2014

गजल-१६५ 

सभ लागल रही साल बीतैत रहल 
बिलमल नै कनी साल बीतैत रहल 

अछि झोँका चलल प्रश्नकेँ एक सए
भेटल की कथी साल बीतैत रहल

बस देखा क' चलि गेल सपने त' बुझू 
जनि सुन्नरि परी साल बीतैत रहल 

अछि शुरुआत पुनि देह मरदनसँ धियक 
टूटल नै कड़ी साल बीतैत रहल

आबो व्यर्थ नै होइ राजीव समय 
नबका किछु करी साल बीतैत रहल  

222 1221 22112 
@ राजीव रंजन मिश्र 

Tuesday, January 7, 2014

गजल-१६४ 

मनुख माल जालकेँ लजा देलक 
छिया डेग डेग पर घिना देलक 

कुकरमी त' भेल पातकी देखू 
सहकि नाक कान सभ कटा देलक 

सजा फेर एक नारि हेबाकें 
सहल ओ धिया हिया कना देलक  

चलल खेल धरि लहास पर सेहो 
सगर राजनीति सभ चला देलक

जँ राजीव आब बानि नै बदलल  
बुझब व्यर्थ प्राण ई धिया देलक 

१२२१ २१२ १२२२ 
@ राजीव रंजन मिश्र 

Wednesday, January 1, 2014

गजल-१६३ 

मरजादाक भान रखने मान होइ छैक सदिखन 
निकहा लेल संग अनका आन होइ छैक सदिखन  

इतिहासक उनटि जँ पन्ना लिअ' त' यैह टा कहत जे
रहने नीक दल सफल कप्तान होइ छैक सदिखन 

गप बाजब अमेरिकाकेँ नीक थिक खराब नै धरि
काजक लोककेँ अपन खरिहान होइ छैक सदिखन 

नेता आचरणसँ निज आदर्श श्रेष्ठ भेल तहने
दुनियामे तकर यशक गुनगान होइ छैक सदिखन

बुझि राजीव गेल करतब आ सिमान अपन से
मनुखक रूपमे पुनमकेँ चान होइ छैक सदिखन

२२२१ २१२२ २१२१ २१२२ 
@ राजीव रंजन मिश्र  
गजल-१६२ 

अंग्रेजी नववर्षक जोश खरोशसँ भरल अवसर पर समस्त मिथिला मैथिल,जेठ श्रेष्ट आ सखा बंधू लोकनिकेँ सादर आ सस्नेह हार्दिक शुभकामनाक संग प्रेषित अछि हमर ई गजल अपने ज्ञानी गुनी जनकेँ सोँझा :

अपन संग होइक बस सभ हालमे 
नवल सोच होइक ऐ नब सालमे 

चलू फेर सभ गोटे मिलि जाइ आ 
खिला दी कमल सगरो महि थालमे 
 
बदलि लेब दुनियाकेँ अपनेसँ हम
रहत फेर तागत नै जंजालमे  

समयकेँ त कोसब वीरक बानि नै 
बड़ी शान सौरभ छै सुरतालमे 

सखा यैह राजीवक शुभकामना 
रही स्वस्थ सुधिगर सभ सभकालमे 

१२२१ २२२ २२१२ 

@ राजीव रंजन मिश्र