Friday, February 15, 2013

सर्दी/शरद/ठंढ/विंटर/जाड 

रातों में नींद सुकून की देती प्यारी कव्वाली शीत काल की 
मन को सदा रिझाने वाली बात निराली शीत काल की 

ग्रीष्म की मेहनत और वर्षा के सींचे बीज के दाने को 
परवान चढ़ा मंजिल दिलवाती सदा दिवाली शीत काल की 

कुछ काँप रहे थर थर तो कुछ रहे शीत को माप रहे 
खट्टा मीठा अहसास दिलाती हर पग मतवाली शीत काल की 

कहीं छलकती मदहोशी तो ठिठुर रहे हालात कहीं
महसूस करें गर दिल दिमाग से हम बदहाली शीत काल की 

मजबूत इरादे पुख्ता सोचों का र्संगम हो बस जीवन में
"राजीव" निखारे रूप सदा मौसम दिलवाली शीत काल की 

राजीव रंजन मिश्र 




आज का उनवान: सर्दी/शरद/ठंढ/विंटर/जाड

जाङे की गर बात करें तो बड़ा सुहाना ठंढा लगता है
फितरत के कारण बेमौसम हर रिश्ता ठंढा लगता है 


बात करें क्या हालातों की देखी जो हर महफ़िल में
होठों पर मुस्कान लिए जग दिवाना ठंढा लगता है


लिये ठोस जज्बात हृदय में निर्धन शीत से बेगाना है
सुख समृद्धि के कम्बल से लिपटा बेचारा ठंढा लगता है 


खुद सोयी जो गीले में,उसके खातिर पूस की रातों में
उस माँ के प्रति व्यवहार पुत्र का सारा ठंढा लगता है 


"राजीव" नहीं है कठिन जरा भी सहना मौसम के जाड़े को
व्यवहार शिथिलता देख मनुज में दुष्कर सा ठंढा लगता है


राजीव रंजन मिश्र 



 शब्द/अक्षर/हर्फ/लव्ज़/ वर्ड ...

शब्द है फूलों की माला शब्द ही तो तीर है 
क़त्ल कर दे जिगर का शब्द वो शमशीर है 

चंद लब्जों के बदौलत इंसानियत महफूज़ है 
चश्मे दिल से देखें अगर सब हर्फ़ की तासीर है

हर्फ़ में जिन्दादिली रख कई शाहेआलम बन गये 
अल्फाज़ के मुफलिसी से बिगड़ा सैकड़ो तकदीर है 

तल्ख़ लहजे लब्ज के,उकूबत है अपने आप में 
जाबित सख्शियत हर दौर में पाता रहा जागीर है 

हर हर्फ़ जो निकले जुबाँ से बस शान्ति का पैगाम हो
"राजीव" नेकी कर सदा बस यह सही तदबीर है 

राजीव रंजन मिश्र 



शमशीर:तलवार 
तासीर :दिखावट,देखने पर जैसा दिखाई पड़े।
उक़ूबत:दंड,सजा,उत्पीड़न,यातना।
जाबित:कठोर नियमों का पालन करने वाला,अनुशासक।
हिमाक़त:बेवकूफी,मुर्खता 
सियासत
क़यादत 
अदालत
 हिमायत 
किल्लत
शरारत
हालत
नफरत
इज़्ज़त
हरारत
इबादत,दावत,अदावत,खयानत,साअत,शराफत,सदाक़त,हजामत

माहताब ,शबाब,लाजवाब,आफ़ताब,नकाब,

अक्सर दिखते हैं
सङक के किनारे
फुटपाथ पर
बढी हुयी दाढी व
मैले कुचेलै वस्त्रों मे
कई विपन्न इन्सान
प्लास्टिक के थैली मे
किसी रेस्तरां के बाहर
फेकें गये खाद्यान्नों के
जूठन को समेटे
पेट भरने को खाते
बङे ही निर्विकार भाव से
अपना भूख मिटाते!

घर घर में है देखा
बच्चों से बूढें तक को
जिह्वा के चाटुकारिता
के वज़ह से कुछ खाते
व अधिक व्यंजनों को
नाले में बेदर्दी से गिराते
बिना एक पल ठहर कर
सोचे हुए कभी भी
कि दुनियां में बेहिसाब
किस्मत के मारे लोग
तरसते हैं ,
मुठ्ठी भर दाने को
अपना भूख मिटाने को।

हम यह मानें कि पेट की
भूख बढाने या दबाने की
चीज़ नहीं बल्कि,
मिटाने की चीज़ है
क्यों ना हम सब
दाने दाने को बचाएं
तन व मन से भरे
लोगों को ठूस-ठूस कर
खिलाने के बजाय
उन बेबस भूखे
गरीबों को खिलायें
जो कि हैं मोहताज़
उनकी क्षुधा मिटायें। 

राजीव रंजन मिश्र  



अगर सोचने पर आयें हम तो बातें हज़ार हैं 
ये बात और कि हम किस हद तक तैयार हैं
भूख के सौ चेहरे दिखते रहते यहाँ दिन रात 
बेशक हर एक के मगर अपने तीमारदार हैं 

दो रोटी नहीं मयस्सर कहीं भूख मिट़ाने को
खा-खा कर दिन रात मगर लाखों बीमार हैं  

कुछ करने की भूख को सिद्दत से संजोकर   
"कल्पना" दिखें जाते हुए अन्तरिक्ष पार हैं  

प्रेम और सौहार्द के भूखे मासूम भटक करके  
इंसानियत को "कसाब" बन करते शर्मसार हैं 

कहाँ तक गिराता इन्सान को वासना की भूख
"कोली" और "पंढेर" के भी हमें हुए दीदार हैं 

"राजीव" मिटायें भूख को बजाय हम बढाने के 
दिन जिंदगी के यहाँ मिलते गिने-गिनाये चार हैं 

राजीव रंजन मिश्र 


जरा सी बात क्या कह दो वो आपे से बाहर हो जाएँ 
गुले गुलफाम जो कह दो वो अपने में शायर हो जाएँ 

इंसानियत तो आजकल बिकती है चंद सिक्कों में
लूटा दो हाथ से पैसे हर कोई जवाहर हो जाएँ 

सच बोलने की खफा क्यों करता है कोई आज के इस दौर में 
ऐसा न हो कि उनके रहमो करम से बेवस व कातर हो जाएँ 

जहाँ देखो वहीं एक हवा सी चली है बातों में सफेदपोशी की 
बस एक मौका लगे जों हाथ तो सब "राजा" के बिरादर हो जाएँ 

किसे पड़ी है आज कल भला इस देश और समाज की "राजीव"
सभी को सोचग्रस्त देखा कि बस कैसे दरिया से सागर हो जाएँ 

राजीव रंजन मिश्र

Wednesday, February 13, 2013



फूलक रस पिययवाला,जखन काँटक गरब सहतै
तहन सूतल पङल मोनक,बैथा सभ हारिकँ कहतै
चलू सुनगा दी हम सभ कोणकँ,ललकारसँ अपन
धधरा जौं ने उठल तौं,कोना आगिक असर रहतै

सदति रहल छै जगती पर,अहीटा बात केर झगड़ा 
हमहीं पइघ आ तू छोट,देखाओत आँखि के हमरा
चलू हम छोऱिकँ ढाठी,सुनी सभ गप एक दोसरक 
फूलत ने मुहँ जौं किनको,तहन रहत कथिक रगड़ा

राखी हम अपन व्यवहारकँ,सुनय आ सुनाबय जोग
भौतिक तापसँ बचिकँ,रही हम चकचक दोगहिं-दोग
भोगैथ वीर धरनीकँ,रहै छैक नाम बस कर्मसँ सभके 
बनी हम वीर आ बुझनीक,बढाबी जोग,जप,तप,भोग

ख़त्म करी आब नाचब गैब,फुसियाहींक नोचब मुँह 
आनी जानी किछु ने जाहिसँ,गैले गीत ने गाबी हम
मोनक साती नाद करैत अछि,नब करी किछुतौं नब 
मिटा धराकँ घोर अन्हरिया,सगरो इजोत फैलाबी हम 

राखब बोध कर्तव्यक,जौं सदिखण मोन-दिमाग मे
करी बस बात टा ने अधिकार के,घर आ समाज मे
पहुँचल चान पर दुनिया,नियार भाष बुद्धि विचारसँ
राखब बानि सुन्नरतौं,रहत कि भांगट राम-राज मे

@ राजीव रंजन मिश्र

फूलों के रस पीनेवाले,जब काँटों का चुभना झेलेंगे 
सोये मन के पीड़ तभी,थक हार व्यथा सारा बोलेंगे 
चलो सुलगा दें सभी दिशायें,हम ललकार से अपने 
धधक उठे न ज्वाला तो फिर असर आग क्या छोड़ेंगे 

सदा रहा है इस जग में,झगड़ा बस इस बात की 
हम बड़े और तुम छोटे,है भान तुम्हें औकात की?
रवैय्या छोड़कर यह हम,सुने एक दुसरे की बात
रहे फिर,रगड़ा भला किस बात की