Monday, January 23, 2012

रात के सन्नाटे को,
चीड़ता हुआ एक पथिक!
अपने ही धुन में मगन,
मिलने को आतुर अपने प्रियवरों से!
चला जा रहा था बेधड़क ,
दिल में कई सपने संजोते हुए!
इस बात से बेखबड़,
कि सपने संजोये नहीं जाते!
वो तो पूर्वनियोजित होते हैं,
किसी सर्वशक्तिमान संचालक के द्वारा!
फिर भी यह छुद्र मनुज कहाँ मानता,
बेहिचक,बेफिक्र हो मनमानी करता!
बस एक पल की बात थी,
टकरा गया सामने से आती हुई क्रूर सच्चाई से!
बिखर गये सपने सारे,
उसके अपने और समग्र परिवार के!
ख़ामोशी को झंझोड़ती  हुयी ,
उसकी दर्दनाक चीख भी!
दहला ना सकी जरा भी,
कुदरत के उस घिनौने  मजाक को!

------अपने प्रिय बंधु स्व. विनोद(गुड्डू) तिवारी के पथ-दुर्घटना में हुए निधन पर,शोकाकुल ह्रदय से निकले दो शब्द!!
राजीव रंजन मिश्र 
१३.०१.२०१२

घर के बड़े -बुढे,
गर सोच के देखा जाय तो,
पेड़ की डाली से लटके हुए,
पके आम की तरह ही होते हैं!
एक ओर,
अगर सम्हाला जाय,
उन्हें हर तरह से,
प्रकृति के झंझवातों से,
तो नित नये रूप से,
स्वाद  दिलाते हैं,
एक सुघड़ व रसीले,
जायके की!
और,दूसरी तरफ!
एक मामूली सी ,
पत्थर की ठोकर भी,
काफी होती है,
उन्हें मजबूर हो,
समय से पहले,
टपक कर गिर जाने को!
कुसमय,अधपके रूप में टूटकर,
सुनसान कर, गुलशन से चले जाने को!

---राजीव रंजन मिश्र 
१३.०१.२०१२

Wednesday, January 18, 2012

हर वक्त बीतने  वाला,कुछ देकर ही जाता है!
हर मोड़ छुटने वाला,एक राह नया लाता है!
हर फूल टूट कर डाली से,एक कली नया लाता है!
हर एक पवन का झोंका,मधुबन को मह्काता है!


हर शाम ढले,रात आती,सन्नाटा छा जाता है!
हर सुबह सबेरे,सूरज आकर,मन ताज़ा कर जाता है!
हर दिन बीत कर,क्रमशः,एक साल बीता जाता है!
हर साल गुजरने वाला,एक वर्ष नया लाता है!


आओ! हम सीखें इनसे,और दृढ संकल्पित  हो कदम बढ़ाएं!
नव उमंग,नव चेतन मन से, शुभ नव वर्ष मनाएं! 




----राजीव  रंजन मिश्र 
०१.०१.२०१२ 
  




जो भी किया हो,दर्द पर शिकवा नहीं किया!
हमने कभी भी ,वादों पर भरोसा नहीं किया!
ठुकरा दी हमने ,बार-बार जन्नत की पेशकश!
ईमान बेच कर,कभी भी सौदा नहीं किया!


खुदा के रहमत का,हम भी हैं हक़दार!
इश्वर ने कभी भी,अपना-पराया नहीं किया!
गम के समन्दरों, में उतरता  चला  गया !
दुःख सहता रहा,उन्हें उलीचा नहीं किया!


कुछ लोग ग़मों के वास्ते ही,बनते हैं,ऐ मेरे दोस्त!
गम पर कभी भी हमने,उफ़ तक नहीं किया!
ढाओ  सितम मजबूर पर,तुम तफरीह के लिये!
ये जान लो की जिन्दगी,मैंने तेरे नाम कर दिया!





हँसता रहा हु अब तक,
कुछ देर मुझे अब रोने दो!
पाता रहा हूँ अब तक,
कुछ तो मुझको अब खोने दो!
देख चूका मधुमास मै तेरा,
अब पतझड़ को आने दो!
गुलशन तेरा मै हो आया,
अब सहरा हो आने दो!
बगिया में तेरे कई फूल सही,
मेरे दामन में कुछ भी तो नहीं!
फूलों कि माला पाया न पिरो,
अब काँटों का हार पिरोने दो!
नादाँ था,खुशियों कि चाहत थी,
अब तो कोई भी चाह नहीं!
किस्मत से समझौते के शिवा,
दूजा तो,कोई भी राह नहीं!
अफ़सोस न कर ऐ 'मीत' मेरे,
कुदरत पे किसी का जोर नहीं!
दिल को,तसल्ली  तू दे ले यूँ,
विधि के विधान का तोड़ नहीं!


१९/०१/१९९५








बेवफा तेरी याद आती है,
जिंदगी के उदास रातों में!
बेड़ियाँ सी पर गयी है,
अब तो अपने ही हाथों में!
साया भी अपना मुझसे,
दामन छुड़ा रहा  है!
दीवाना हूँ इस कदर कि,
पागल बना रहा है!
हँसता किसी को देखूं,
सोंचू रुला रहा है!
नादाँ न जाने क्यूँ कर,
क़यामत बुला रहा है!
खुशियों से जैसे दिल को,
नफरत सी हो गयी है !
हर वक्त मौन रहना,
फितरत सी हो गयी है!
चाहत यही है मेरी,
कि,तेरी याद यूँ ही आये!
तुझको कभी न भूलूं,
भले जान मेरी जाये!


१९/०१/१९९५ 






देखता ही रहा,मै य़ू ही हर हमेशा!
                    खुशियाँ आई मगर मुस्कुरा न सका!!
कहने को तो,चमन खिल रहे थे मगर!
                  हार फूलों का फिर भी पीरों न सका!!
मन में कुढ़ता रहा,अपने किस्मत पर मगर!
                   खुल कर जुल्मो-सितम पे रो न सका!!
थी मयस्सर मुझे,सेज फूलों की मगर!
                    नींद अमन चैन की फिर भी सो ना सका!! 
तनहा कटता रहा,जिंदगी का सफ़र!
                     अपना कोई हमारा हो ना सका!!
तहे दिल से,जीवन में चाहा जिसे!
                'मीत' उनके ही दिल को भा ना सका!!
---राजीव रंजन मिश्रा 'मीत'
    १३/०२/१९९५