Monday, January 7, 2013

शब्द है फूलों की माला शब्द ही तो तीर है 
क़त्ल कर दे जिगर का शब्द वो शमशीर है 

चंद लब्जों के बदौलत इंसानियत महफूज़ है 
चश्मे दिल से देखें अगर सब हर्फ़ की तासीर है

हर्फ़ में जिन्दादिली रख कई शाहेआलम बन गये 
अल्फाज़ के मुफलिसी से बिगड़ा सैकड़ो तकदीर है 

तल्ख़ लहजे लब्ज के,उकूबत है अपने आप में 
जाबित सख्शियत हर दौर में पाता रहा जागीर है 

हर हर्फ़ जो निकले जुबाँ से बस शान्ति का पैगाम हो
"राजीव" नेकी कर सदा बस यह सही तदबीर है 

राजीव रंजन मिश्र 





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